थाने के बगल में दो दशक से खुला फड़, पुलिस की खामोशी पर सवाल

थाने के बगल में दो दशक से खुला फड़, पुलिस की खामोशी पर सवाल

सफेदपोश दिन में नेता-समाजसेवी, रात को बावन परियों के दीवाने
छोटे सटोरियों पर दबिश, बड़े रसूखदारों पर पुलिस क्यों खामोश..?

क्या पुलिस केवल गरीबों पर ताकत दिखा अपनी पीठ थपथपा रही है..?


सक्ती:--जिला बनने के बाद से पुलिस हर रोज़ अवैध शराब और सट्टा जुए पर सख्ती का डंका पीटती है। प्रेस नोट जारी होते हैं, फोटो खिंचते हैं और “कार्रवाई जारी है” का राग अलापा जाता है। लेकिन सवाल ये है – नगर कोतवाली से महज़ 20 मीटर दूर, दो दशकों से चल रहे करोड़ों के जुए पर पुलिस क्यों खामोश है..?
सूत्र बताते हैं कि पुलिस को इस जुए की पूरी खबर है, नाम-पता सब मालूम है। यहां तक कि कई बार कप्तान स्तर से कार्रवाई के निर्देश भी थाने तक पहुंचे, लेकिन हुआ क्या? थानेदार और उनके नुमाइंदे खुद जुआरियों को कप्तान का मैसेज दिखाकर कहते – “कुछ दिन शांत रहो।” नतीजा – आज भी हर रात आठ से बारह बजे तक यहां शराब के गिलास टकराते हैं, बावन परी की गोटियाँ बजती हैं और लाखों-करोड़ों का दांव खेला जाता है।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिले भर में छोटे-मोटे सटोरियों को पकड़कर प्रेस रिलीज़ में नंबर बढ़ाए जाते हैं, फोटो सेशन होता है और पुलिस अपनी पीठ थपथपाती है। लेकिन थाना से लगी गली में बैठने वाले सफेदपोश जुआरियों को देखकर पुलिस की आंखें झपक जाती हैं। क्या पुलिस को डर है? क्या यहां कोई अदृश्य ताक़त है, जो थाने के दरवाजे पर ताला डाल देती है?

लोग कहते हैं कि यह फड़ इतना रसूखदार है कि पुलिस को कार्रवाई के लिए कई जन्म लेने पड़ेंगे। यह बयान भले व्यंग्य लगे, लेकिन पुलिस की खामोशी इसे सच साबित करती है। प्रदेश में सत्ता परिवर्तन के बाद उम्मीद थी कि रसूखदारों पर भी गाज गिरेगी, लेकिन यहां तो वही पुराना खेल जारी है।
अब सवाल यह है कि पुलिस कब अपनी “ताक़त” दिखाएगी – गरीबों के झोपड़े में दबिश देने के बजाय थाने के बगल में चल रहे करोड़ों के इस फड़ पर..? या फिर यह खेल यूं ही चलता रहेगा और पुलिस केवल दिखावे की कार्रवाई कर जनता को गुमराह करती रहेगी..?

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